भारतीय सनातन संस्कृति में करवा चौथ का व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम, त्याग और विश्वास के लिए मनाया जाने वाला पावन उत्सव है। हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण चतुर्थी को किया जाने वाला यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत शुभ होता है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर सरगी खाती हैं और दिनभर बिना खाना खाए बिना पानी पिए निर्जला व्रत रखती हैं। रात में चांद को देखने और अरग देने के बाद ही पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो महिला सच्चे मन और नियम से करवा चौथ का व्रत रखती है और Karwa Chauth ki Vrat Katha सुनती है, उसके पति को लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और हर काम में सफलता मिलती है, साथ ही वैवाहिक जीवन के सारे दुख दूर हो जाते हैं। आइए इस व्रत का आध्यात्मिक महत्व, शुभ मुहूर्त, इसकी पौराणिक कथाएं, पूजन मंत्र, सामग्री लिस्ट, इस व्रत को लेकर विभिन्न राज्यों की परम्पराएं और उद्यापन की पूरी विधि बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं।
करवा चौथ व्रत एक नजर में
| त्योहार का नाम | करवा चौथ (करक चतुर्थी) |
| तिथि एवं पक्ष | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि |
| व्रत का स्वरूप | पूर्ण निर्जला उपवास (सूर्योदय से चंद्रोदय तक जल की एक बूंद भी वर्जित) |
| मुख्य पूज्य देवी-देवता | भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, स्वामी कार्तिकेय एवं चंद्रदेव, करवा चौथ माता |
| मुख्य पूजन | सरगी सेवन, संकल्प मंत्र, करवा फेरना, व्रत कथा सुनना, चंद्र दर्शन व अर्घ्य |
| व्रत का उद्देश्य | पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, आरोग्य और घर में सुख-समृद्धि |
| पारण का तरीका | छलनी से चांद फिर पति को देखना, पति के हाथ से जल व मिठाई ग्रहण करना |
Karwa Chauth Date and Shubh Muhurat 2026
पंचांग और शास्त्रीय गणना के अनुसार इस साल करवा चौथ 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त एवं चंद्रोदय समय की सटीक जानकारी नीचे दी गई है:
- करवा चौथ व्रत की तिथि: 29 अक्टूबर 2026 वार गुरुवार
- कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 28 अक्टूबर 2026 को शाम 08:45 बजे से
- कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर 2026 को शाम 06:15 बजे तक
- पूजा का शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल): शाम 05:38 बजे से शाम 06:55 बजे तक (कुल अवधि: 1 घंटा 17 मिनट)
- चांद निकलने का समय: रात्रि 08:12 बजे तक (अलग-अलग शहरों के पंचांग अनुसार 5 से 10 मिनट का फर्क हो सकता है)
- सरगी सेवन का शुभ समय: 29 अक्टूबर 2026 को सुबह 04:15 बजे से सुबह 05:10 बजे तक (सूर्योदय से पहले)
करवा चौथ का आध्यात्मिक एवं शास्त्रीय महत्व
‘करवा चौथ’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘करवा‘ यानी मिट्टी का लोटे जैसा कलस जो सुख-समृद्धि और पंचतत्वों जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का प्रतीक है और ‘चौथ’ यानी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि।
सनातन परंपरा में मिट्टी के करवे को बहुत ही शुभ माना गया है, इसमें भरा जल जीवन की शक्ति को दर्शाता है। इस व्रत का धार्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह एक नारी की उस आत्मिक शक्ति को प्रकट करता है, जो अपनी तपस्या और भक्ति के बल पर यमराज से भी अपने पति के प्राणों की रक्षा कर सकती है। जब एक महिला पूरे दिन निर्जला रहकर संध्या समय पूरे विधि-विधान से भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश और चंद्रदेव की पूजा करती है, तो घर-परिवार में सात्विक ऊर्जा और शांति का संचार होता है।
करवा चौथ व्रत के मुख्य संकल्प एवं शास्त्रीय पूजन मंत्र
शास्त्रों के अनुसार कोई भी उपवास यदि सही संकल्प और मंत्रों के साथ किया जाए, तो उसका फल कई गुना बढ़ जाता है, पूजा के समय इन मंत्रों का जाप अवश्य करें:
सुबह उठते ही व्रत का संकल्प मंत्र
सुबह स्नान के बाद हाथ में जल, रोली और अक्षत लेकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके यह संकल्प मंत्र बोलें:
“मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।”
अर्थात: हे परमेश्वर! मैं अपने सौभाग्य, संतान की उन्नति, सुख-शांति और स्थिर समृद्धि की प्राप्ति के लिए करवा चौथ का व्रत करने का पूर्ण मन से संकल्प लेती हूं।
पूजा के दौरान जपने वाला देव मंत्र
- माता पार्वती पूजन मंत्र: ॐ नमः शिवाय
- भगवान शिव पूजन मंत्र: ॐ नमः शिवाय
- श्री गणेश पूजन मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः
- स्वामी कार्तिकेय पूजन मंत्र: ॐ षण्मुखाय नमः
- चंद्रदेव अर्घ्य मंत्र: ॐ सोमाय नमः या फिर ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्॥
सरगी का सही समय, नियम और ध्यान रखने वाली बातें
सरगी करवा चौथ व्रत का सबसे पहला और अनिवार्य हिस्सा है, जो सास अपनी बहू को प्रेम और आशीर्वाद के रूप में देती है।
सरगी का सही समय
सरगी हमेशा सूर्योदय से लगभग 2 से 3 घंटे पहले सुबह 04 बजकर 15 मिनट से 05 बजकर 10 मिनट के बीच करना बहुत ही शुभ होता है। सूर्योदय की लालिमा प्रकट होने के बाद कुछ भी खाना-पीना वर्जित होता है।
सरगी में क्या खाएं और क्या न खाएं?
- क्या खाएं: सरगी में नारियल पानी, ताजे फल जैसे केला, सेब, अनार, भीगे हुए बादाम-अंजीर, दूध और फेनी या सेवईं खा सकते है। नारियल पानी और फल दिनभर शरीर में हाइड्रेशन बनाए रखते हैं और कमजोरी महसूस नहीं होने देते।
- क्या न खाएं: अधिक तली-भुनी चीजें, चटपटी और बहुत ज्यादा मीठी मिठाइयां खाने से बचें। ऐसी चीजें खाने से दिन में बहुत तेज प्यास लगती है और पेट में एसिडिटी भी हो सकती है।
करवा चौथ पूजा की सामग्री लिस्ट
पूजा की तैयारी पहले से कर लेना बहुत जरूरी होता है, आपकी सुविधा के लिए करवा चौथ पूजा की सामग्री लिस्ट को चार आसान भागों में यहां बताया गया है:

सरगी की सामग्री
- ताजे फल: केला, सेब, अनार
- सूखे मेवे: अखरोट, काजू, बादाम, किशमिश, दूध-फेनी, सेवईं या सात्विक मिठाई, नारियल पानी
- सुहाग का सामान: साड़ी, चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी सहित सुहाग की सामग्री
पूजा थाली और करवे की सामग्री
- मिट्टी का करवा और उसके ऊपर रखने वाला ढक्कन
- मौली यानी कलावा
- रोली
- अक्षत
- हल्दी
- चंदन
- छलनी: चंद्रमा और पति को देखने के लिए
- देशी घी का दीपक
- रुई की बत्ती
- धूप व अगरबत्ती
- धूप के लिए धूपबत्ती और गोबर के कंडे
- भोग लगाने के लिए हाथों से बनाया हुआ प्रसाद
सुहाग सामग्री माता पार्वती को चढ़ाने के लिए
- लाल चुनरी
- सिंदूर
- महावर
- मेहंदी
- बिंदी
- हरी या लाल चूड़ियां
- आलता
- काजल
- बिछिया
- पायल
- शीशा
- कंघी
- नाक की नथनी
- कान के झुमके
- मंगलसूत्र या हार
- इत्र
अर्घ्य और पारण सामग्री
- शुद्ध जल से भरा कलश
- थोड़ा सा कच्चा दूध व अक्षत जल में मिलाने के लिए
- भोग के लिए घर का बना हलवा, पूरी या लड्डू
करवा चौथ व्रत में किन किन बातों का ध्यान रखें
- पूर्ण निर्जला उपवास: सूर्योदय से चंद्रोदय तक जल का पूरी तरह त्याग करें।
- शुभ वस्त्र धारण करें: पूजा के समय लाल, नारंगी, गुलाबी, हरे या पीले रंग के पारंपरिक वस्त्र पहनें, इस पावन दिन पर काले या सफेद रंग के वस्त्र पहनना अशुभ माना जाता है।
- सोलह श्रृंगार: करवा चौथ के दिन सुहागिनों को पूरे सोलह श्रृंगार करके पूजा में बैठना चाहिए, हाथों में मेहंदी रचाना बहुत जरूरी होता है।
- सकारात्मक व्यवहार: दिनभर मन में भक्ति भाव रखें, चिड़चिड़ बिल्कुल ना करें, किसी पर गुस्सा न करें, न ही किसी बड़े-बुजुर्ग का अनादर करें।
- धारदार वस्तुओं का प्रयोग न करें: इस दिन सिलाई कढ़ाई करना, कैंची, सुई या चाकू जैसी नुकीली चीजों का उपयोग करना अच्छा नहीं माना गया है।
क्या कुंवारी लड़कियां करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं?
आजकल कुंवारी लड़कियां और मंगेतर भी मनचाहे वर या अपने होने वाले पति के लिए यह व्रत रखती हैं, उनके लिए नियम थोड़े अलग होते हैं:
- कुंवारी लड़कियों के लिए नियम: कुंवारी लड़कियां मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं। वे निर्जला के स्थान पर फलाहारी व्रत भी रख सकती हैं। रात में वे चंद्रमा को देखकर और अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं।
- मंगेतर के लिए नियम: जिनकी सगाई हो चुकी है, वे अपने होने वाले पति के लिए यह व्रत रख सकती हैं। वे भी चांद को अर्घ्य देकर और अपने मंगेतर की फोटो को देखकर व्रत का पारण कर सकती हैं।
स्वास्थ्य और गर्भावस्था की स्थिति में करवा चौथ व्रत कैसे रखें?
शास्त्रों में कहा गया है— ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्‘ अर्थात शरीर ही धर्म का पहला साधन है। स्वास्थ्य से समझौता करके व्रत रखना उचित नहीं माना गया है:
- गर्भवती महिलाएं: गर्भवती महिलाओं को पूर्ण निर्जला व्रत रखने से बचना चाहिए, वे सुबह सरगी लेने के बाद दिन में दूध, नारियल पानी और ताजे फल का फलाहार लेकर व्रत रख सकती हैं।
- दवाईयां लेने वाली महिलाएं: यदि आप किसी बीमारी की नियमित दवा ले रही हैं, तो व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें। सुबह सरगी के समय या शाम की पूजा के बाद हल्का आहार व दवा अवश्य लें।
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करवा चौथ की प्रामाणिक पौराणिक व्रत कथाएं
चौथ के दिन Karwa Chauth ki Vrat Katha सुनना बहुत जरूरी माना गया है। इस कथा के बिना व्रत का फल पूरा नहीं मिलता है। यहां करवा चौथ की मुख्य प्रामाणिक कथा जो पूजा में पढ़ी जाती है और एक प्रेरक पौराणिक कथा भी दी जा रही है, जिसे आप पूजा के साथ में अगर चाहें तो पढ़ सकते है:
करवा चौथ की मुख्य प्रामाणिक कथा: साहूकार के 7 बेटों और बहन वीरावती की कथा
एक बहुत ही पुराने समय की बात है। एक नगर में एक धर्मपरायण साहूकार रहता था। उसके 7 बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरावती था। जब वीरावती का विवाह हुआ, तो वह अपने पहले करवा चौथ पर मायके आई हुई थी।
वीरावती ने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा, लेकिन वीरावती बहुत नाजुक थी और दिनभर भूखी-प्यासी रहने के कारण शाम होते होते भूख और प्यास से बेहाल हो गई। उसके सातों भाई अपनी बहन की यह हालत देख नहीं पा रहे थे। उन्होंने अपनी बहन से खाना खाने को कहा, लेकिन वीरावती ने मना कर दिया और कहा कि वह चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही जल ग्रहण करेगी।
अपनी बहन की हालत सुधारने के लिए भाइयों ने एक तरकीब निकाली, उन्होंने दूर एक पहाड़ी पर पीपल के पेड़ के पीछे एक बड़ा सा दीया जलाकर रख दिया और कपड़े की छलनी लगाकर ऐसा दृश्य बना दिया मानो आसमान में चांद निकल आया हो। भाइयों ने आकर वीरावती से कहा, “बहन देखो आसमान में चांद निकल आया है, तुम अर्घ्य देकर व्रत खोल लो।”
वीरावती ने अपने भाइयों की बात पर विश्वास कर लिया और उस छद्म चंद्रमा को देखकर अर्घ्य दे दिया और भोजन करने बैठ गई। जैसे ही उसने पहला निवाला मुंह में डाला, उसे छींक आ गई। दूसरा निवाला डाला तो उसमें बाल निकल आया और जैसे ही उसने तीसरा निवाला मुंह में रखा, तभी उसके ससुराल से समाचार आया कि उसके पति अचानक बहुत बीमार हो गए हैं और उनके प्राण संकट में हैं।
वीरावती रोती हुई तुरंत अपने ससुराल भागी। रास्ते में उसे माता पार्वती और भगवान शिव मिले। माता पार्वती ने उसे बताया कि उसने असली चांद को देखे बिना ही छल से व्रत खोल दिया था, जिससे करवा माता रुष्ट हो गई हैं।
वीरावती ने अपनी गलती स्वीकार की और माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। माता पार्वती ने उसके सच्चे पश्चाताप को देखकर उस पर दया की और उसे एक छोटी सी सींक देकर कहा कि वह पूरे साल हर माह की चतुर्थी तिथि का नियमपूर्वक व्रत रखे और अपने पति की खूब सेवा करे, वीरावती ने पूरी निष्ठा से ऐसा ही किया। उसकी कठिन तपस्या और भक्ति से करवा माता प्रसन्न हुईं और उसके पति को फिर से जीवनदान व अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद दिया।
सब मिलकर बोलो: है करवा माता वीरावती पर बीती वैसी किसी पर ना बीते, और उसे आशीर्वाद मिला वैसा सबको मिले।
प्रेरक पौराणिक कथा: जब चंद्रदेव ने ली सुहागिन नंदिनी की परीक्षा
प्राचीन समय में हिमालय की तलहटी में चंद्रपुर नाम का एक सुंदर राज्य था। वहां नंदिनी नाम की एक धर्मपरायण स्त्री अपने पति वीरेंद्र के साथ रहती थी, जो राज्य का एक साहसी सैनिक था। नंदिनी हर साल करवा चौथ का व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा करती थी।
एक बार राज्य में युद्ध छिड़ गया और वीरेंद्र सीमा पर चला गया। कई महीने बीत गए लेकिन वीरेंद्र का कोई संदेश नहीं आया। करवा चौथ का दिन आया, तो नंदिनी ने अपने पति की सुरक्षा के लिए निर्जला व्रत रखा।
शाम को जब नंदिनी पूजा की तैयारी कर रही थी, तब एक वृद्ध और भूखी महिला उसके द्वार पर आई। नंदिनी खुद निर्जला व्रत पर थी, फिर भी उसने उस बुजुर्ग महिला को सम्मानपूर्वक जल और फल दिए। वृद्ध महिला ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया और कहा, “धर्म केवल पूजा की थाली में नहीं, बल्कि जरूरतमंद की मदद में भी होता है।“
शाम के समय आसमान में काले बादल छा गए और चांद कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। नंदिनी ने मन ही मन माता पार्वती का ध्यान किया, तभी आकाश में दिव्य प्रकाश के साथ चंद्रदेव प्रकट हुए। चंद्रदेव ने नंदिनी की परीक्षा लेने के लिए पूछा, “हे नारी! यदि तुम्हारे त्याग से तुम्हारे पति के साथ-साथ अन्य लोगों या शत्रुओं के प्राण भी बच सकते हों, तो तुम क्या करोगी?“
नंदिनी ने उत्तर दिया, “प्रभु! सच्चा प्रेम और धर्म कभी स्वार्थी नहीं होता, मैं चाहती हूं कि मेरे पति सुरक्षित लौटें, लेकिन मैं किसी अन्य परिवार का दुख नहीं चाहती, यदि मेरे पुण्य कर्मों से सभी घायल सैनिकों का कल्याण हो, तो यह मेरा सौभाग्य होगा।”
नंदिनी के इस निष्काम भाव और करुणा को देखकर चंद्रदेव और माता पार्वती प्रकट हुए। उन्होंने नंदिनी के पति वीरेंद्र की रक्षा की और युद्ध समाप्त कर उसे सकुशल घर पहुंचा दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे व्रत का अर्थ केवल व्रत रखना नहीं, बल्कि अपने मन में सभी के प्रति दया, प्रेम और करुणा की भावना रखना भी एक तरह का व्रत और धर्म होता है।
करवा चौथ पूजा की आसान विधि
प्रथम चरण: सुबह का संकल्प व सरगी
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें, सास का आशीर्वाद लेकर सरगी ग्रहण करें और संकल्प मंत्र बोलकर व्रत की शुरुआत करें।
द्वितीय चरण: शाम की पूजा की तैयारी
शाम के समय पूजा स्थान को साफ सुथरा करके गंगाजल छिड़कें, लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर शिव-परिवार और करवा माता का चित्र या मूर्ति है तो मूर्ति स्थापित करें। करवे में जल भरें, रोली से करवे पर स्वास्तिक बनाएं और मौली बांधें। करवे के ढक्कन में शक्कर या मिठाई रखकर दीया जलाएं।
तृतीय चरण: कथा और करवा फेरना
माता पार्वती को सुहाग सामग्री और चुनरी चढ़ाएं, हाथ में गेहूं के 13 दाने और फूल लेकर Karwa Chauth ki Vrat Katha को ध्यान से सुनें। कथा के अंत में सभी महिलाएं मिलकर करवे को आपस में फेरने की रस्म निभाते हुए इन पारंपरिक पंक्तियों को दोहराएं:
“करवा माता दे दो वरदान, सुहाग मेरा सदा रहे आबाद“
चंद्र अर्घ्य एवं पारण विधि पारंपरिक बोल के साथ
जब आकाश में चंद्रमा के दर्शन हों, तो पूरे श्रद्धाभाव के साथ चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करना चाहिए।
चंद्र अर्घ्य के लिए पारंपरिक बोल
छलनी में जलता दीया रखकर चंद्रमा को देखते समय उत्तर भारत में यह पारंपरिक पंक्तियां बोलने का विधान है:
“चन्दा ए चन्द्रावलिए, चन्दा आया बार में।
उठ सुहागन अरग दे, मैं बैठी थी बाट में॥“
अर्घ्य और पारण की विधि
- अपनी पूजा की थाली तैयार कर लें, जिसमें जल से भरा लोटा, जलता हुआ दीया, छलनी और मिठाई रखी हो।
- जलते हुए दीपक को छलनी में रखकर सबसे पहले छलनी से चांद को देखें।
- लोटे के जल में थोड़ा सा कच्चा दूध, रोली और अक्षत मिला लें।
- इसके बाद चंद्रदेव की दिशा में जल की धार अर्पित करते हुए “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जाप करें, अर्घ्य देते समय ध्यान रखें कि जल की छीटें आपके पैरों पर न पड़ें, इसके लिए नीचे कोई बर्तन रख लें।
- अर्घ्य देने के बाद हाथ जोड़कर चंद्रदेव से अपने पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
- फिर छलनी से अपने पति का चेहरा देखें और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें।
- अंत में पति अपनी पत्नी को अपने हाथ से जल पिलाते हैं और मिठाई खिलाकर व्रत का पारण कराते हैं।

भारत के अलग-अलग राज्यों में करवा चौथ की परम्पराएं
करवा चौथ एक ऐसा व्रत है जिसे भारत देश के सभी राज्यों में बड़े उत्सव से मनाया जाता है लेकिन राज्यवार इसके लिए नियम और तरीके अलग अलग होते हैं:
1. पंजाब सरगी, फेनी और ‘वीरो कुड़िये करवड़ा’
पंजाब में सरगी की थाली में ‘फेनी’ यानि दूध-सेवईं खाना सबसे जरूरी माना जाता है। शाम को सुहागिनें एक साथ गोल घेरा बनाकर बैठती हैं और पारंपरिक पंजाबी गीत “वीरो कुड़िये करवड़ा, सर्व सुहागन करवड़ा…” गाते हुए थाली फेरने की रस्म को निभाती हैं।
2. उत्तर प्रदेश कांस की सींकें और बायना
UP में मिट्टी के करवे की टोंटी में 5 से 7 कांस की सींकें लगाना बहुत जरूरी माना जाता हैं। शाम को पूजा के बाद ‘बायना’ निकाला जाता है, जिसमें सुहाग सामग्री, अनाज और शगुन के पैसे रखकर सासू मां को दिए जाते हैं।
3. राजस्थान चौथ माता, बरवाड़ा मंदिर और घेवर
राजस्थान में सवाई माधोपुर के प्रसिद्ध ‘चौथ का बरवाड़ा’ मंदिर की बहुत मान्यता है। यहां पूजा में माता को विशेष रूप से ‘घेवर’ का भोग लगाया जाता है।
4. हरियाणा मायके का बाया
हरियाणा में शादीशुदा बहनों के लिए उनके मायके या भाइयों की तरफ से ‘बाया’ भेजा जाता है, जिसमें सुहाग के नए वस्त्र, गहने, शगुन के रूपये और मिठाइयां होती हैं।
5. हिमाचल प्रदेश पहाड़ी करवे और धाम
हिमाचल में मिट्टी के विशेष चित्रित करवे उपयोग किए जाते हैं। रात को व्रत का पारण करने के बाद यहां विशेष पहाड़ी दावत ‘धाम’ बनाई जाती है।
6. दिल्ली-NCR मेहंदी नाइट्स व सामूहिक पूजा
दिल्ली-एनसीआर की सोसायटियों में महिलाएं एक साथ पार्क या कॉमन हॉल में इकट्ठा होकर सामूहिक पूजा पाठ करती है और करवा चौथ की कथा सुनती हैं।
विशेष परिस्थिति में व्रत कैसे करें?
- यदि पीरियड्स आ जाए: महिलाएं व्रत का पूरा पालन कर सकती हैं। वे पूजा स्थान से थोड़ी दूरी बनाकर कथा सुन सकती हैं, लेकिन पूजा के सामान, करवे व मूर्तियों को न छुएं। उनके स्थान पर परिवार की कोई अन्य सुहागिन स्त्री उनके नाम की पूजा करके अर्घ्य की रस्म निभा सकती है।
- यदि आसमान में बादल हों और चांद न दिखे: अगर खराब मौसम के कारण चांद दिखाई नहीं दे, तो पंचांग में दिए गए चंद्रोदय के समय उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके चंद्रदेव का ध्यान करें। भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा का स्मरण करके अर्घ्य अर्पित करें और पति के हाथ से जल पीकर पारण करें।
करवा चौथ उजमन की विधि
जब महिलाएं 12 या 16 वर्षों तक व्रत पूरा करने के बाद इसका उद्यापन यानी उजमन करना चाहती हैं, या पहली बार उद्यापन कर रही हैं, तो इस शास्त्रीय विधि का पालन करें:
- 13 थालियों की तैयारी: 13 अलग-अलग थालियों या बर्तनों में 4-4 पूरियां और हलवा रखें।
- वस्त्र और दक्षिणा: हर थाली के साथ सुहाग सामग्री, वस्त्र और सामर्थ्य अनुसार शगुन की दक्षिणा रखें।
- बायना निकालना: एक मुख्य थाली में सासू मां के लिए सुहाग का सामान जैसे साड़ी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी और दक्षिणा रखकर हाथ में जल व रोली लेकर आचमन करें और संकल्प लें।
- बायना समर्पित करने के पारंपरिक बोल: सासू मां के पैर छूकर बायना देते समय यह पारंपरिक पंक्ति बोलकर आशीर्वाद लें: “हे सासू मां! सुहाग का यह बायना स्वीकार करें और सदा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद दें।“
- 13 सुहागिनों का पूजन: उद्यापन के दिन 13 सुहागिन महिलाओं और पंडित जी को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराएं, उन्हें टीका लगाकर सुहाग सामग्री व उपहार भेंट करके उनका आशीर्वाद लें।
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Karwa Chauth ki Vrat Katha से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल – FAQs
क्या करवा चौथ के व्रत में पानी पी सकते हैं?
नहीं, यह पूर्ण निर्जला व्रत होता है। चंद्र दर्शन और अर्घ्य से पहले जल ग्रहण नहीं किया जाता। लेकिन अगर आप गर्भवती या अस्वस्थ महिलाओं में से है तो व्रत के दौरान डॉक्टर की सलाह पर फलाहारी जल ले सकती हैं।
क्या बिना सरगी खाए भी करवा चौथ का व्रत रखा जा सकता है?
यदि किसी कारणवश आप सुबह सरगी न खा पाएं, तब भी आप सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प ले सकती हैं और पूरे नियम से उपवास पूरा कर सकती हैं।
क्या करवा चौथ पर केवल लाल रंग के कपड़े ही पहनने चाहिए?
लाल रंग सौभाग्य एवं सुहाग का प्रतीक माना जाता है, लेकिन आप नारंगी, गुलाबी, पीला, हरा या मेरून रंग भी पहन सकती हैं। इस दिन काले और सफेद रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
करवा चौथ की पूजा के बाद करवे के जल का क्या करना चाहिए?
पूजा वाले करवे में रखे जल को अगले दिन नीम के पौधे या किसी पवित्र गमले में डाल दें।
अगर पति घर पर न हों या विदेश में हों तो व्रत कैसे खोलें?
चंद्रमा को अरग देने के बाद आप वीडियो कॉल पर पति का चेहरा देखकर या उनकी फोटो देखकर जल ग्रहण कर सकती हैं।

OM Choudhary Katha Vaani के संस्थापक और लेखक हैं। उन्हें सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अध्ययन में विशेष रुचि है। वे सरल और विश्वसनीय भाषा में धार्मिक विषयों को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को समझ सकें।