सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का स्थान सबसे ऊपर होता है। जेठ के महीने में जब सूर्य देव अपने प्रचंड वेग से तपते हैं, तब बिना अन्न और जल की एक भी बूंद ग्रहण किए व्रत रखना आध्यात्मिक साधना की सबसे बड़ी परीक्षा है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति साल भर की अन्य सभी एकादशियों का उपवास नहीं रख पाते, वे केवल इस एक निर्जला एकादशी व्रत को पूरी निष्ठा से करके संपूर्ण एकादशियों का फल एक साथ प्राप्त कर सकते हैं। आइए महाभारत काल की उस पावन कथा को गहराई से जानते हैं, जिसने महाबली भीमसेन के अंदर के अहंकार को मिटाकर उन्हें परम मोक्ष का मार्ग दिखाया था।
Nirjala Ekadashi Vrat Ki Kahani 2026 Key Pointes
| मूल शास्त्र संदर्भ – | पद्म पुराण (उत्तर खण्ड, अध्याय 52) और महाभारत (अनुशासन पर्व) |
| एकादशी के अन्य प्रचलित नाम – | भीमसेनी एकादशी, पाण्डव एकादशी, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी |
| मुख्य आराध्य देव – | भगवान विष्णु (श्री हरि नारायण) |
| व्रत की मुख्य अवधि – | दशमी की रात्रि 8 बजकर 9 मिनट से द्वादशी को सुबह 9 बजकर 33 मिनट तक |
| एकादशी व्रत की तिथि | 25 जून 2026 (गुरुवार) |
| पारण का समय | 26 जून 2026 को सुबह 5:18 से 9:33 बजे तक |
| मुख्य आध्यात्मिक नियम – | आचमन के अतिरिक्त जल की एक भी बूंद ग्रहण करना वर्जित |
| प्रमुख दान सामग्री – | जल से भरा मिट्टी का घड़ा (कुंभ), खरबूजा, पंखा, छाता, वस्त्र |
| मुख्य कैटेगरी | निर्जला एकादशी व्रत कथा कहानी |
Nirjala Ekadashi Vrat Katha In Hindi : महाभारत काल की वो कथा जिसने भीम को सही राह दिखाई
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के अध्याय 52 में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार महाभारत काल के दौरान महर्षि वेदव्यास जी ने पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने समझाया कि प्रत्येक महीने के दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को उपवास रखने से मनुष्य के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं।
व्यास जी के वचनों को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने पूरी श्रद्धा के साथ हर महीने आने वाली एकादशी पर निराहार रहने का संकल्प लिया। माता कुंती और द्रौपदी भी इस नियम का कड़ाई से पालन करने लगीं, जिससे इंद्रप्रस्थ में सुख, शांति और समृद्धि का वास होने लगा।
लेकिन पांडवों में सबसे बलशाली और भोजन प्रिय भीमसेन के लिए यह स्थिति बड़ी विकट हो गई। भीम के उदर (पेट) में ‘वृक’ नाम की एक विशेष जठराग्नि थी। इस अत्यधिक तीव्र भूख के कारण वे चाहकर भी एक पहर से ज्यादा भूखे नहीं रह सकते थे, जिसके कारण वे व्रत रखने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहे थे।
भीमसेन की व्याकुलता और व्यास जी से गुहार
जब भी एकादशी की तिथि आती, पूरा राजपरिवार उपवास रखता, लेकिन भीम अपनी शारीरिक लाचारी के कारण भोजन ग्रहण कर लेते थे। इस बात से उन्हें मन ही मन बहुत ग्लानि महसूस होने लगी कि वे भगवान श्री हरि विष्णु की भक्ति से वंचित रह जाते हैं। अंततः व्याकुल होकर भीमसेन महर्षि वेदव्यास जी की शरण में पहुंचे।
भीम ने करबद्ध होकर कहा, “हे परम ज्ञानी पितामह! मेरे परिवार के सभी सदस्य एकादशी का व्रत बड़ी भक्तिभावना एवं सहजता से पूरा कर लेते हैं। लेकिन मेरे भीतर की भूख मुझे एक पल भी चैन नहीं लेने देती है। क्या भोजन न छोड़ पाने के कारण मुझे कभी मोक्ष नहीं मिलेगा? कृपया मुझे कोई ऐसा सुलभ उपाय बताएं जिससे मुझे नरक का भागी न बनना पड़े।”
वेदव्यास जी ने महाबली भीम की इस सच्ची पीड़ा और उनके संकोच को सुना और भली-भांति समझा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “पुत्र भीम! यदि तुम वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों का व्रत रखने में खुद को असमर्थ पाते हो, तो तुम ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस एकमात्र ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत करो। इस एक दिन के तप से तुम्हें साल भर की सभी एकादशियों का पुण्य एक साथ मिल जाएगा।”

भीमसेन का अहंकार और वरुण देव का प्रसंग
महर्षि वेदव्यास जी ने भीम को आगे समझाया कि तुम्हें अपनी शारीरिक शक्ति और गदा युद्ध पर बहुत अभिमान है, लेकिन असली शक्तिशाली वह योद्धा है जो अपनी भूख, प्यास और चंचल इंद्रियों को अपने वश में कर सके। व्यास जी की बात सुनकर भीम ने भगवान केशव पर पूर्ण भरोसा रखकर इस परम कठिन उपवास को करने का दृढ़ संकल्प ले लिया।
जब जेठ की झुलसाने वाली दुपहरी आई, तो प्यास से कंठ सूखने लगे और भूख के कारण भीम के शरीर की पूरी ऊर्जा समाप्त होने लगी। दोपहर होते-होते महाबली भीमसेन निढाल होकर भूमि पर बैठ गए। तब उन्हें जीवन में पहली बार अहसास हुआ कि संसार में जल यानी वरुण देव की एक बूंद की कीमत उनके विशाल शारीरिक बल से कहीं बढ़कर है। इस पावन व्रत ने न केवल भीम को मुक्ति का मार्ग दिखाया, बल्कि उनके भीतर छिपे शारीरिक बल के सूक्ष्म अहंकार को भी पूरी तरह चूर कर दिया।
शरीर में पानी की तीव्र कमी के बावजूद, भीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह नियंत्रित किया और पूरा दिन तथा रात भगवान नारायण के ध्यान और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र के मानसिक जाप में व्यतीत की।
अगले दिन द्वादशी को सुबह सूर्योदय के बाद जब भीम ने पारण करने का प्रयास किया, तो वे अपनी सुध-बुध खोकर अचेत हो गए। तब युधिष्ठिर और अर्जुन ने उन्हें पवित्र गंगाजल पिलाकर चेतना में वापस लाया। इसी परम तप के कारण इस पावन तिथि को भीमसेनी एकादशी एवं पाण्डव एकादशी भी कहा जाने लगा और तभी से Nirjala Ekadashi Vrat Katha का पाठ करने की सनातनी परंपरा अटूट चली आ रही है।
निर्जला एकादशी व्रत कथा का वास्तविक अर्थ
इस कथा का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण बहुत गहरा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं है, बल्कि अपने मन की असीमित इच्छाओं और ज्ञानेंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना एवं उन्हें नियंत्रित करना है।
कथा में भीम का अत्यधिक भोजन प्रिय होना असल में इंसानी मन की उन अनियंत्रित भौतिक इच्छाओं का प्रतीक है, जो कभी शांत नहीं होतीं। जब भीम जैसा अति-भोजन प्रिय व्यक्ति अपने संकल्प के बल पर पानी तक का त्याग कर सकता है, तो आधुनिक पीढ़ी के युवा भी अपने जीवन में अनुशासन, एकाग्रता और बुरी आदतों पर नियंत्रण पाने की प्रेरणा लेकर अपना जीवन सुधार सकते हैं।
Nirjala Ekadashi Vrat Katha से मिलने वाली सीख
- दृढ़ संकल्प की शक्ति: यदि मन में ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हो, तो दुनिया का सबसे कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किया जा सकता है।
- इंद्रिय संयम का महत्व: कही बार मन को विचलित करने वाली परिस्थितियों में भी अपनी आदतों और जीभ पर नियंत्रण रखना ही सच्ची आंतरिक ताकत होती है।
- भाव की प्रधानता: भगवान मनुष्य की शारीरिक बनावट या उसकी बड़ी-बड़ी क्षमताओं को नहीं देखते, बल्कि उसके हृदय की सच्ची श्रद्धा और प्रयास को खुशी से स्वीकार करते हैं।
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निर्जला एकादशी व्रत के समय ध्यान रखने वाली खास बातें
- ब्राह्म मुहूर्त में शुरुआत: इस पावन दिन सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें और भगवान विष्णु के प्रिय पीले रंग के वस्त्र ही धारण करें।
- घट स्थापना और कुंभ दान: पूजा स्थल पर मिट्टी के कोरे घड़े (कुंभ) में शुद्ध जल भरकर, उस पर सफेद कपड़ा बांधें। फिर उस पर चीनी, खरबूजा या गुड़ का पात्र रखकर दक्षिणा सहित संकल्प करके योग्य व्यक्ति को अथवा किसी गरीब को दान कर दें, इससे पितरों को परम तृप्ति मिलती है।
- सात्विक आचरण: व्रत की पूरी अवधि में मन के भीतर किसी के भी प्रति ईर्ष्या, द्वेष, क्लेश, क्रोध, अपशब्द या नकारात्मक विचारों को न आने दें।
दान का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
- निर्जला एकादशी का दिन ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी में आता है, शास्त्रों में इस दिन उन वस्तुओं का दान करने का विशेष विधान है, जो किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भीषण तपती धूप और प्यास से राहत दिला सकें, इसे ‘ग्रीष्मकालीन दान’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दूसरों की पीड़ा को शांत करना।
- जल से भरा घड़ा (कुंभ): यह वरुण देव को प्रसन्न करने और जीवन की रक्षा करने का प्रतीक है।
- मौसमी फल (खरबूजा): यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है और पितरों को तृप्ति प्रदान करता है।
- पंखे और छाता: यह दान व्यक्ति के जीवन से ‘तपन’ और कष्टों को दूर करने का प्रतीक है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह परंपरा समाज में जल संरक्षण और परोपकार की भावना को बढ़ावा देती है, भीषण गर्मी में प्यासे व्यक्ति को जल पिलाना ‘नर नारायण सेवा’ के समान फलदायी माना गया है।
निर्जला एकादशी व्रत के नियम पद्म पुराण के अनुसार
- व्रत कब शुरू करें और कब खोलें (पारण नियम): यह व्रत दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू हो जाता है, दशमी की रात को सात्विक भोजन करने के बाद से अन्न का त्याग करें, एकादशी के पूरे दिन और रात पूरी तरह निर्जल रहें, इस व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण मुहूर्त में ही खोला जाता है।
- हरिवासर का विशेष ध्यान: द्वादशी तिथि शुरू होते ही तुरंत व्रत खोलने की भूल न करें। द्वादशी के शुरुआती प्रथम चौथाई भाग लगभग 5 से 6 घंटे को ‘हरिवासर’ कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, हरिवासर की अवधि में पारण करना वर्जित माना जाता है, यह समय बीतने के बाद ही व्रत खोलना सबसे ज्यादा फलदायी होता है।
- जल का संपूर्ण त्याग: व्रत की मुख्य अवधि में जल पूरी तरह वर्जित है। हालांकि, पूजा के समय केवल तीन बूंद जल से आचमन करने की अनुमति शास्त्र देते हैं, जो केवल कंठ शुद्धि के लिए होता है।
- चावल और तामसिक भोजन का निषेध: घर के जो सदस्य किसी कारणवश यह कठिन व्रत नहीं रख रहे हैं, उन्हें भी इस दिन चावल, लहसुन और प्याज के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए।
- रात्रि जागरण का विधान: एकादशी की रात को सामान्य दिनों की तरह सोना नहीं चाहिए, बल्कि भगवान विष्णु के भजनों का कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करना चाहिए।
निर्जला एकादशी व्रत के दौरान स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखें
निर्जला एकादशी का व्रत जितना कठिन है, उतना ही लाभकारी भी होता है, अपनी शारीरिक क्षमता बनाए रखने के लिए दशमी की रात को भारी भोजन के बजाय हल्का और सुपाच्य सात्विक आहार जैसे मूंग की दाल या लौकी की सब्जी लें। द्वादशी के दिन पारण के तुरंत बाद बहुत अधिक भारी भोजन या भारी तली-भुनी चीजें न खाएं।
इसके बजाय पहले तुलसी दल और जल ग्रहण करें, उसके बाद धीरे-धीरे फल या हल्का अनाज लेकर अपने पाचन तंत्र को पुनः सामान्य होने का समय दें। ऐसा करना आपके स्वास्थ्य एवं आपकी ऊर्जा को संतुलित रखने में मदद करेगा।
Nirjala Ekadashi ka Vrat Kaise Karte Hain
शास्त्रों में मान्यता है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से साधक को लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और बहुत सारे पुण्य की प्राप्ति होती है। महिलाएं इस व्रत को विशेष रूप से अपने परिवार की दीर्घकालिक सुख-समृद्धि, संतान की उन्नति और अखंड सौभाग्य के लिए अत्यंत निष्ठा के साथ रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया तप इंसान के अनजाने में हुए सभी पापों को भी खत्म कर देता है। मृत्यु के उपरांत जीवात्मा को यमदूतों का सामना नहीं करना पड़ता, बल्कि भगवान विष्णु के दिव्य दूत उन्हें आदरपूर्वक वैकुंठ धाम लेकर जाते हैं।
एकादशी व्रत से भगवान गणेश की प्रसिद्ध प्रथम पूज्य होने की कथा और उनके आशीर्वाद के महत्व के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप यहां से गणेश जी की कहानी को पढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष: Nirjala Ekadashi Vrat Katha केवल एक प्राचीन पौराणिक वृत्तांत नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाए रखने का एक माध्यम है। जेठ की तीव्र तपन में पानी का त्याग करके हम अपनी आंतरिक और मानसिक शक्ति का परिचय देते हैं, जो हमें जीवन की हर मुश्किल परिस्थिति से लड़ना सिखाती है।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और पौराणिक ग्रंथों के विभिन्न संदर्भों पर आधारित है। व्रत, पूजा की विधियों और तिथियों का पालन करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग, परिवार के भरोसेमंद पंडितजी और परिवार की परंपराओं का परामर्श अवश्य लें। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, गर्भावस्था या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में उपवास रखने से पहले चिकित्सक की सलाह ही सर्वोपरि होगी। लेखक या वेबसाइट इस सामग्री में दी गई जानकारी के किसी भी व्यक्तिगत प्रयोग से होने वाले किसी भी परिणाम के लिए जिम्मेदार नहीं है।
Nirjala Ekadashi 2026 FAQs
क्या पीरियड्स में भी निर्जला एकादशी व्रत रख सकते हैं?
हां, पद्म पुराण के अनुसार मासिक धर्म में भी यह व्रत रखा जा सकता है, आप मानसिक रूप से उपवास रखें, लेकिन ठाकुर जी की मूर्तियों, तुलसी दल और पूजा सामग्री को न छुएं, पूजा किसी अन्य से करवाएं और स्वयं दूर बैठकर कथा सुनें।
अगर बहुत ज्यादा प्यास के कारण तबीयत बिगड़ने लगे, तो क्या नींबू पानी पी सकते हैं?
शास्त्रों में इस व्रत को बिना जल के ही पूर्ण करने का नियम है, हालांकि यदि प्राण संकट में हों या गंभीर बीमारी हो तो नींबू पानी या फल लिया जा सकता है, शास्त्र कहते हैं कि प्राण रक्षा धर्म सर्वोपरि है, ऐसे में व्रत खंडित नहीं माना जाता।
क्या गर्भवती महिलाएं या छोटे बच्चों की माताएं यह व्रत रख सकती हैं?
नहीं, शास्त्रों में गर्भवती, बीमार और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए निर्जल रहने की सख्त मनाही है, गर्भस्थ शिशु और नवजात के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वे फलाहार, दूध या जूस पीकर सामान्य एकादशी व्रत का पालन कर सकती हैं।
निर्जला एकादशी के दिन आचमन करते समय कितना पानी मुंह में डालना शास्त्र सम्मत है?
आचमन के समय केवल उतनी ही बूंदें जल की हथेली में लेनी चाहिए, जिससे उड़द का एक दाना डूब सके यानी लगभग तीन बूंद, कंठ शुद्धि के लिए इस जल को मुंह में डालकर अंदर लेना शास्त्र सम्मत है, इससे अधिक मात्रा में जल पीना व्रत को भंग करने जैसा माना जाता है।
निर्जला एकादशी के व्रत का पारण (व्रत खोलना) किस समय और किस चीज से करना चाहिए?
एकादशी उपवास के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद हरिवासर का समय समाप्त होने पर शुभ पारण मुहूर्त में भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें, इसके बाद सबसे पहले तुलसी दल और जल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
एकादशी के दिन सुहागिन महिलाओं के लिए क्या दान करना सबसे शुभ और फलदायी माना गया है?
सुहागिन महिलाओं को इस दिन शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ा (कुंभ), खरबूजा, आम, हाथ का पंखा, नए वस्त्र, छाता और सुहाग की सामग्री जैसे सिंदूर, बिंदी और चूड़ियों का दान करना सबसे अधिक फल और पुण्य देता है।
क्या निर्जला एकादशी के दिन सुबह मंजन या ब्रश किया जा सकता है?
हां, आप सुबह दांतों की सफाई के लिए दातून या मंजन कर सकती हैं, लेकिन आपको बहुत अधिक सावधानी बरतनी होगी ताकि कुल्ला करते समय पानी की एक भी बूंद गलती से भी आपके गले से नीचे न उतरे।
यदि अनजाने या भूलवश पानी पी लिया जाए, तो क्या व्रत टूट जाता है, इसका उपाय क्या है?
अगर अनजाने में ऐसा हुआ है तो घबराएं नहीं, भगवान श्री हरि से मन ही मन क्षमा याचना करें और व्रत को पूरा करें, अगले दिन अपने इस अनजाने पाप के प्रायश्चित स्वरूप किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न और जल का विशेष दान दें।
एकादशी तिथि के दिन घर में भारी साफ-सफाई या झाड़ू लगाने की सख्त मनाही क्यों होती है?
पौराणिक मान्यता है कि इस पवित्र दिन घर में अधिक साफ सफाई या झाड़ू लगाने से चींटी और अन्य सूक्ष्म जीवों को अनजाने में चोट पहुंच सकती है, जिससे जीव नष्ट करने का पाप लगता है, इसलिए इस दिन बहुत ही सरल तरीके से सावधानीपूर्वक सफाई की जाती है।
क्या कुंवारी लड़कियां मनपसंद जीवनसाथी की कामना के लिए एकादशी व्रत रख सकती हैं?
हां, कुंवारी कन्याएं भी अपने जीवन में अच्छे संस्कार, एकाग्रता और मनचाहे, योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए पूरे नियम और सच्ची श्रद्धा के साथ इस पवित्र उपवास को रख सकती हैं।
क्या निर्जला एकादशी के दिन सुहागिन महिलाओं को बाल धोने चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार एकादशी तिथि पर सुहागिन महिलाओं को बाल धोने से बचना चाहिए, यदि बहुत आवश्यक हो, तो आप दशमी तिथि के दिन ही बाल धो लें या फिर एकादशी को बिना शैंपू/साबुन के केवल सादे जल से स्नान करें।
यदि परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु के कारण ‘सूतक’ लगा हो, तो क्या यह व्रत रख सकते हैं?
सूतक की स्थिति में भी भूखा-प्यासा रहना मानसिक रूप से व्रत रखा जाना चाहिए, हालांकि इस दौरान भगवान की मूर्तियों को छूना, दीपक जलाना या प्रत्यक्ष दान करना मना होता है, आप केवल मन ही मन नाम जप कर सकती हैं।
क्या इस दिन घर की रसोई में नमक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?
जो लोग व्रत रख रहे हैं, उनके लिए नमक पूरी तरह वर्जित है, यदि परिवार के अन्य सदस्यों का व्रत नहीं हैं, तो वे भोजन में सेंधा नमक का उपयोग कर सकते हैं, इस दिन पूरे परिवार को सादे समुद्री नमक और भारी या तामसिक भोजन के प्रयोग से बचना चाहिए।
निर्जला एकादशी व्रत कब है 2026?
इस 2026 की ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी तिथि 24 जून वार बुधवार की रात को 8 बजकर 9 मिनट से शुरू हो रही है जो अगले दिन 25 जून की रात्रि 9 बजकर 15 मिनट तक रहेगी।
निर्जला एकादशी व्रत का पारण कैसे और कब करें?
यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले खत्म हो जाती है तो निर्जला एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही किया जाता है, द्वादशी तिथि के खत्म होने से पहले पारण करना बहुत शुभ माना जाता है, इस व्रत का पारण हरि वासर के दौरान नहीं करना चाहिए।
निर्जला एकादशी व्रत 2026 का पारण कितनी बजे करें?
ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी व्रत पारण का शुभ मुहूर्त 26 जून 2026 की सुबह को 5 बजकर 18 मिनट से शुरू होगा जो 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगा, इस बीच आपको पारण करना अनिवार्य है।

OM Choudhary Katha Vaani के संस्थापक और लेखक हैं। उन्हें सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अध्ययन में विशेष रुचि है। वे सरल और विश्वसनीय भाषा में धार्मिक विषयों को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को समझ सकें।